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सिलसिला बराबरी का – अब सेना में भी!

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भारत में महिला सशक्तिकरण एक ज्वलंत मुद्दा है। हर कोई इसपे अपनी राय रखता है, ठीक है आपको रखने का भी अधिकार है। यदि हम पूरे विश्व से आंकें, तो भारतीय महिलाओं का स्तर और हमारी अर्थव्यवस्था, दोनों में जायदा मेल नहीं है। मेरा मतलब, जहाँ हम आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहे हैं, महिलाओं का स्तर उसी तेज़ी से नहीं बढ़ रहा। दुर्भाग्य की बात ये है की पुरुषों की सोच में गिरावट दर्ज़ की गयी है।

अगर आप ऐसे नहीं हैं, तो में आपको सादर प्रणाम करता हूँ, किन्तु आप मेरी बात से सहमत हैं या नहीं ये निचे बताएँ –

क्या आप अपने आस – पास महिलाओं पर अधिक दबाव को महसूस करते हैं?

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हाँ तो जब बात बराबरी की है, तो महिलाएँ किसी से कम हैं क्या? मेने अपनी माँ को आज तक सबसे जायदा मेहनत करते हुए देखा है। कैसे वो सुबह जल्दी उठ कर घर का सारा काम करती थीं, पूरा दिन कुछ न कुछ करने के बाद रात में सबके बाद सोती थीं। बदलती परिस्तियों में भी आज भारतीय महिला एक अच्छी बहु, बेटी, बीबी , प्रोफ़ेशनल का रोल बखूबी निभा रही है। इस सबके बावज़ूद आजतक हम समानता का वादा एवं प्रचार तो कर रहे हैं, किन्तु ज़मीनी स्तर पर बहुत कम ही दीखता है। चाहे वो संसद हो या सेना, दोनों ही जगह बराबरी की बात है पर बराबरी है नहीं। जहाँ राजनीति में महिलाओ को अभी सशक्त करना बाकि है, वही सेना में अब ये कुछ साफ़ दिख रहा है।

एक क्रन्तिकारी फैसले में, माननीय उच्चतम न्यायालय ने अब महिलाओ को परमानेंट कमीशन प्रदान करने के हक़ में वोटिंग की है। मतलब, आज़ादी के 70 साल बाद भी ये केवल पुरुष ऑफिसर्स तक सिमित था। कोर्ट के इसे सच्ची बराबरी करार दिया है। कोर्ट ने कहा – “based on sex stereotypes premised on assumptions about socially ascribed roles of gender which discriminates against women”. इसके साथ-साथ कोर्ट ने बदलते समय के साथ mindset में बदलाव की बात पर भी ज़ोर दिया।

 

Image by Engin_Akyurt from Pixabay

ये एक सराहनीय कदम है। इससे न केवल तत्कालीन महिला अफसरों का मोराल बढ़ेगा अपितु आने वाली पीढ़ी भी इस फ़ैसले से प्रोत्साहित होगी एवं देश रक्षा में अणि भागीदारी सुनिश्चित करेगी।

हमे अपनी संस्कृति पे हमेशा से गर्व रहा है। भारत की सबसे अच्छी विशेषता ये है की हम लोगों में समय के साथ-साथ अपने को ढ़ालने की क्षमता है। जो भी गलत होता है , हमारा समाज उनका आंकलन करता है और फिर सही को अपनाता है। कितनी सारी कुरीतिओं को हम छोड़ चुके हैं और आगे बढ़ चुके हैं। मुझे विश्वास है की बहुत जल्दी हम आज़ के समाज़ की इस सबसे बढ़ी कुरीति को दूर करने में सफल होंगे। वैसे कोशिशें जारी हैं और सफलता जल्दी ही मिलेगी ।

आज में आपके सामने कुछ ऐसे पहलू रखूँगा जिससे आप समझ जाएँगे के समानता कितनी आवश्यक है किसी भी देश, प्रान्त की खुशहाली एवं समृद्धि के लिए। जब कोई भी नारी जो सक्षम है और किसी भी कारण से आगे बढ़ने से वंचित रहती है तो ये न केवल उसका अपितु पूरे देश के लिए चिंता का विषय है ।

आइये देखते हैं कैसे –

1. अर्थवयवस्था – एक पढी लिखी लड़की का काम ना करना भी हमारी इकॉनमी पे बोझ है। आज लोग बेटिओं को पढ़ा रहे हैं लेकिन पढाई खत्म होते ही शादी और नो करियर। यहाँ तक कि शादी के बाद तो बहुत सी कामकाज़ी महिलायें भी हाउसवाइफ बनना पसंद करती हैं। क्या कारण है के लड़कियाँ ऐसा कदम उठती हैं? बहुत से कारण होंगे ,लेकिन सुरक्षा का अभाव, ऑफिस में असुरक्षित महसूस करना, eve-teasing इसका एक बढ़ा कारण है। ज़रा सोचिये जब भारत की पूरी महिला शक्ति पुरषो के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चलेगी तो उसकी बात ही कुछ और होगी। ये हमारे देश को फिरसे सोने की चिड़िया , विश्व गुरु एवं रोज़गार का अड्डा बनाने में बहुत बड़ा कदम होगा।

2. सामाजिक इस्थिरता – जहाँ भारत के ग्रंथो में नारी को सर्वोच्च पद प्राप्त हैं, सबसे ज्यादा देविओं को हम भारतीय ही पूजते हैं, वहीं महिलाओं के साथ हो रहे दुर्व्यवहार भी भारत में सबसे अधिक हैं। हमें अपनी पुरष-प्रधान समाज की मानसिकता बदलनी होगी। सही सम्मान, सही समय पर, आने वाले समय में भारत का निर्माण करेगा। राम को पूजने वाले देश में सही मायने में रामराज्य तभी संभव है।

तो आप मुझे बताइए की आपके घर में , ऑफिस में या आसपास “रामराज्य” है या नहीं? और इसमें आपकी क्या भागीदारी है? आपके उत्तर से सभी पाठको को सिखने को मिलेगा।

 

आपके घर में महिलाओ को लेकर कैसा माहौल है ?

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